भारत का जितना पुराना इतिहास है उतने ही मजेदार किस्से इतिहास मे घटित हुए हैं। आज के समय मे भी शासकों की खिल्लीयां उड़ाई जाती हैं फ़र्क बस इतना है कि तब जमाना राजतंत्र का था अब लोकतंत्र का है। लेकिन तानाशाही और मनमानी अब भी बरकरार है और तब भी थी। ऐसा ही एक किस्सा तुगलक वंश के दुसरे शासक मुहम्मद बिन तुगलक का है जिसने अपने शासनकाल मे जनता से नाकों चने चबवाये। अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों एवं दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण इसे ‘स्वप्नशील’, ‘पागल’ एवं ‘रक्त-पिपासु’ कहा गया है। उसने अपने शासनकाल में ऐसे मनमाने ढंग से काम किये जिससे जनता विद्रोह पर उतर आई थी और पूरे इतिहास में उसे लंपट शासक और बेवकूफ और ना जाने क्या क्या नामों से जाना जाता है।

तुगलक के बारे में:
- पूरा नाम: मुहम्मद बिन तुगलक (मूल नाम: जौना खान)
- पिता: ग़यासुद्दीन तुगलक
- शासनकाल: 1325 – 1351 ई.
- राजधानी स्थानांतरण: दिल्ली से दौलताबाद (महाराष्ट्र) — यह योजना विफल रही।
- टोकन मुद्रा: तांबे के सिक्के चलाना — नकली सिक्कों के कारण योजना असफल हुई।
- दक्षिण भारत में अभियान: विजय प्राप्त की, लेकिन स्थायी नियंत्रण नहीं बना सका।
- विद्वान शासक: अरबी, फारसी, गणित, चिकित्सा और दर्शन में रुचि थी।
- मृत्यु: 1351 ई. में सिंध क्षेत्र में एक
क्या था कारण, जिससे लोग लंपट शासक कहते थे?
मुहम्मद बिन तुगलक अपने शासन काल मे 5 ऐसी योजनाओं को लागू करने का आदेश दिया जो उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई, उसने इन नीतियों को जबरन, किसी दूरदर्शी परिणाम को सोचे बिना लागू किया। उसकी मूर्खता या तानाशाही कहें या फिर उसका सौभाग्य! उसने अपने शासन काल में ऐसा बवंडर मचाया कि उसके शासन मे 34 से ज्यादा विद्रोह हुए, जिसमे अकेले 27 विद्रोह दक्षिण भारत में हुए। तुगलक ने अपने शासनकाल में निम्न नीतियाँ नीतियाँ लागू करवाईं-
1.दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि:
उत्तर भारत मैदान में स्थित दोआब की जमीन उपजाऊँ होने से फसल अच्छी होती थी। तुगलक ने वहाँ पर आय का बड़ा जरिया समझकर वहाँ के किसानों पर 40-50% तक कर वृद्धि कर दी। लेकिन उसी साल दोआब में भयंकर सूखा और अकाल पड़ गया। तुगलक के अधिकारियों ने वहाँ के किसानों से जबरन कर वसूलना चालू कर दिया। जिससे राज्य में किसानों के द्वारा जबरदस्त विद्रोह हुआ।
2.राजधानी परिवर्तन:
तुगलक वंश के शासक मुहम्मद बिन तुगलक ने 1327 में अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरी) स्थानांतरित कर दी थी। इस राजधानी परिवर्तन के दौरान हजारों लोगों की जान गई थी, जिनमें महिलाओं और बच्चे भी शामिल थे। सुल्तान तुगलक नें दक्षिण में पकड़ बनाने और उत्तर से मंगोलों के आक्रमण से बचने के लिए किया था। देवगिरि को “कुव्वतुल इस्लाम” भी कहा गया। सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने देवगिरि का नाम ‘कुतुबाबाद’ रखा था और मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने इसका नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया। सुल्तान की इस योजना के लिए सर्वाधिक आलोचना की गई। दिल्ली से दौलताबाद के बीच प्लेग से पीड़ित लगभग दो-तिहाई सेना के लोग मारे गए।
3.दिल्ली वापसी:
दौलताबाद को राजधानी बनाने की असफलता से निराश तुगलक ने 1335 में फिर से लोगों को दौलताबाद से दिल्ली वापस आने की अनुमति दे दी। जिससे बची-खुची जनता फिर से दिल्ली वापसी की। जिससे जनता मे अपने शासक के प्रति असंतोष और बढ़ गया।
4.Token मुद्रा का प्रचलन:
तीसरी योजना में तुगलक ने सांकेतिक व प्रतीकात्मक सिक्कों का प्रचलन करवाया। दोकानी नामक सिक्के का प्रचलन पीतल और तांबे के धातुओं से बनाया गया जिसका मूल्य चांदी के एक टका के बराबर था। बरनी के अनुसार उस समय हर लोहार की भट्टी, फर्जी टकसाल का रूप ले लिया था। बाजार में इतने खोटे सिक्कों की भरमार से पूरी अर्थव्यवस्था ठप्प हो गई थी। क्योंकि लोग लगान भी खोटे सिक्के से देने लगे थे। जिससे तुगलक को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।

5.खुरासान एवं कराचिल अभियान:
मुहम्मद तुग़लक़ ने खुरासन को जीतने के लिए ३,७०,००० सैनिकों की विशाल सेना को एक वर्ष का अग्रिम वेतन दे दिया, परन्तु राजनीतिक परिवर्तन के कारण दोनों देशों के मध्य समझौता हो गया, जिससे सुल्तान की यह योजना असफल रही और उसे आर्थिक रूप से हानि उठानी पड़ी। कराचिल अभियान के अन्तर्गत सुल्तान ने खुसरो मलिक के नेतृत्व में एक विशाल सेना को पहाड़ी राज्यों को जीतने के लिए भेजा। उसकी पूरी सेना जंगली रास्तों में भटक गई, इब्न बतूता के अनुसार अन्ततः केवल दस अधिकारी ही बचकर वापस आ सके। इस प्रकार मुहम्मद तुग़लक़ की यह योजना भी असफल रही।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से तुगलक कैसा शासक था?
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से तुगलक एक पढ़ा-लिखा शासक था, लेकिन उसकी तानाशाही ने उसे क्रूर और पागल बना दिया। वह जिन नीतियों को लागू करता उसके परिणामों की चिंता किये बिना करता था। बर्नियर और इब्न बतूता जैसे समकालीन यात्रियों ने उसे एक “विचित्र लेकिन प्रतिभाशाली शासक” कहा। आधुनिक इतिहासकारों ने उसे “एक असफल प्रतिभा” की संज्ञा दी है।
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